की तुमसे बिछड़े हुए बीता है एक अरसा,
पर जेहन में आज भी हैं तुम्हारी यादें टंगी हुई।
कभी कभी कई दिन निकल जाते हैं आधे अधूरे से ,
और फिर किसी दिन छा जाती हो पूरे चांद की तरह आसमान में टंगी हुई।
ऐसे में होकर भी कोई तन्हा नहीं होता,
ना जाने कितनी ही कटी हैं ऐसी रातें जगी हुई।
दिल चाहता है की ठहर जाऊं उन्ही लम्हों में पर,
कितनी ही जिम्मेदारियां है जिंदगी के पेड़ों पे लगी हुई।
की तुमसे बिछड़े हुए बीता है एक अरसा,
और फिर भी किसी दिन छा जाती हो पूरे चांद की तरह आसमान में टंगी हुई।
सिक्कों की तरह उछलते है सुख और दुख,
और सिक्कों के संग है आदमी की औकात लगी हुई।
जिन्हे देख कर आता था सुकून इन आंखों को,
आज वही तस्वीर न जाने किस संदूक की है तलबगार बनी हुई।
की तुमसे बिछड़े हुए बीता है एक अरसा,
और फिर भी किसी दिन छा जाती हो पूरे चांद की तरह आसमान में टंगी हुई।
(- रोमिल)


