जमीन पे फैला ज्ञान का सागर,

तुम लिए बैठे मोबाईल की गागर।

शहर की भागम भाग का रोना,

हमने जाने कबसे पकड़ रखा ये कोना।


याद जो पुराने वक्त की आती,

सारी पगडंडियां यही मिल जाती।

देश के हालात, राजनेताओं की बात।

चाय की चुस्की, दोस्तों का साथ।


सुख दुख के रंग यही पे खेले,

आज देखो बैठे हैं अकेले।

उम्मीद है आज तो कोई आएगा,

उम्र निकल गई ये वक्त भी निकल जायेगा।