महारानी लक्ष्मीबाईजी
मणिकर्णिका नाम उसका,
वाराणसी में जन्म पाया था|
शास्त्रार्थ के साथ उसको,
शस्त्र विद्या ने भी बहुत लुभाया था||
मनु बुलाते उसे प्यार से सब,
पिता की वह अकेली संतान थी|
एक आदर्श वीरांगना वो,
भारतीय वसुंधरा की शान थी||
अल्पायु में मां को खो कर,
पिता संग बाजीराव के दरबार जाती थी|
अपने नटखट शौर्य पूर्ण स्वभाव से,
सबको बहुत लुभाती थी||
पेशवा ने पुत्री सा प्यार दिया,
नाना की मुंहबोली बहन बनी|
छबीली नाम मिला उसे,
वीरता की थी वह बहुत धनी||
बचपन में सुनी वीर गाथाओं से,
उसने अपने हृदय को सजाया था|
7 वर्ष की आयु में,
घुड़सवार में क्या खूब सामर्थ्य दिखाया था||
खेलकूद की उम्र में,
अस्त्र-शस्त्र में निपुण हुई|
फिर धनुर्विद्या पाकर,
उसकी शिक्षा पूर्ण हुई||
समय बीता, 1842 में,
लिखी गई फिर एक नई कहानी|
महाराजा गंगाधर राव से विवाह हुआ,
लक्ष्मीबाई नाम से बनी झांसी की रानी||
आगे चल पुत्र रत्न पाया,
झांसी में फिर खुशियां छाई थी|
4 माह बाद पुत्र खोया,
क्या नियति को भी दया नहीं आई थी||
दामोदर राव गोद लिया,
पति को फिर उसने खोया था|
यह अन्याय देख,
कुदरत भी खूब रोया था||
राज्य हड़प नीति डलहौज़ी लाया,
ब्रिटिशर्स का वार यह तीखा था|
पर गलत के सामने झुकना,
भला लक्ष्मीबाई ने कब सीखा था||
गुस्से से धीरे-धीरे विद्रोह हुआ,
1857 की हिंसा भड़क उठी|
दिल्ली, झांसी, लखनऊ, बनारस,
की भी आत्मा तड़प उठी||
दामोदर को बांध पीठ पर,
मैदान में खड़ी भवानी थी|
लक्ष्मी रूप में शक्ति अवतार है वो,
यह बात अंग्रेजों को बतानी थी||
भीषण युद्ध चला,
अंग्रेजों को धूल चटाई थी|
वह रानी लक्ष्मीबाई थी,
या स्वयं काली नरसंहार करने आई थी||
महारानी फिर कालपी पहुंची,
वहां तात्या संग योजना बनाई थी|
चुप कैसे रहती भला वो,
आखिर अंग्रेजों की क्रूर नीति उसे रास ना आई थी||
फिर घमासान युद्ध हुआ,
रानी ने क्या खूब वीरता दिखाई थी|
अंततः ह्यूरोज के वार से,
रानी लक्ष्मीबाई ने वीरगति पाई थी||
रानी की कुशलता से स्तब्ध,
अंग्रेजों ने भी उनकी वीरता गायी थी|
एक अकेली मर्द थी वह क्रांतिकारियों में,
ह्यूरोज ने यह बात बताई थी||
यह गौरवपूर्ण बलिदान,
कभी ना भुला जाएगा|
और नारी शक्ति का जब-जब विवरण होगा,
तब लक्ष्मीबाई का नाम सबसे पहले आएगा||
- ओजस्वनी शर्मा
"मेरे अल्फ़ाज़"


