तारों की भीड़ में अकेला चाँद कब तक रहता,

वो भी तो गुम हो गया एक तारा बनकर।


हज़ारों रौशनी में डूबे शहर की गलियाँ भी,

मेरी तन्हाई चमकी बस एक किनारा बनकर।


नदी भी सागर से मिलते ही खो जाती है,

मैं भी घुल गया हूँ तेरे दामन की धारा बनकर।


ये दिल की धड़कनें भी अब शोर सी लगती हैं मुझे,

चुप हूँ मगर गूँज रहा हूँ कोई इशारा बनकर।


ये चुप्पी भी बोल उठेगी सदियों का प्यार बनकर,

तुम भी रुक जाओ ना यहीं हमारा बनकर।


---पंकज साहनी