तुम मेरे आकाश के सूरज के जैसे हो प्रिये! तुम मेरे अभिमान के ऊंचे हिमालय हो प्रिये! तुम मेरा विस्तार हो और मेरा आधार हो तुम मेरी कविता-कहानी लेखनी की धार हो संजिदा संजिवनी मुश्किल घड़ी की साथ हो। तुम मेरा विश्वास हो प्राणवायु आस हो श्वांस मेरी हो प्रिये! तुम विरह की आग मे स्पंदनों मे तुम प्रिये! तुम मिलन की राग मे और समर्पण मे प्रिये! भोर की हो तुम किरण सांझ का कोई दीप हो तुम दिवाली की खुशी होली की हर रंग हो दीप हो आंगन की मेरे नीम की कोई छांव हो तुलसी हो चौखट की मेरी मेरा अमिट सम्मान हो तुम मेरे माथे का टीका दीप्त मेरा भाल हो। तुम मेरे आकाश के सूरज के जैसे हो प्रिये! तुम मेरे अभिमान के ऊंचे हिमालय हो प्रिये!