
सुलझ गये तो और उलझ जाएंगे
रोटी और भूख की बातें करेंगे
गैरजरूरी थे, जरूरी हो जायेंगे
इन्हें अनसुलझा ही रहने दो।
बैठकर हुक्मरान! लाशों के तख्त पर
नेकनियति का उम्मीद करते हो
अब जिन्दा ही कहां है जमीर हम सबका
किसके लिये नयी उम्मीद रखते हो।
सुबह को शाम लिखते हो, और रात को दिन
भरी दुपहरी चांद-तारों की बात करते हो
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