तुम मेरी होकर भी मेरी हो न पाई क्यों कभी मैं तुम्हारा था नहीं लेकिन तुम्हारा हूँ प्रिये! मौन होकर मैं सुनाता हूँ तुम्हे कुछ गीत मैं अनसुने कुछ राग लेकर गा रहा हूँ मैं प्रिये! गा रहा मन-प्राण पर खो रही संवेदना बन पतंगा आग में जल रहा हूँ मैं प्रिये! क्या पता, किस डोर से बंध गया हूँ, प्रेम में हो रहा बिक्षिप्त लेकिन हंस रहा हूँ मैं प्रिये!