हूँ बिहारी, हाँ बिहारी, मैं बिहारी शान हूँ मिट्टी की मासूमियत की मैं अकेली जान हूँ। श्रमजीवी हूँ, श्रम से मैं रोटी कमाता हूँ कर्मजीवी बन, जगत का भार ढोता हूँ। ये महल जो दिख रहे, इस शहर के भाल पर ये गगनचुम्बी इमारत, छू रहे आकाश को इन महल की सीढ़ियों मे खून है मेरा मिला तुम निकलकर इन महल से पूछते- मैं कौन हूँ? पत्थरों की नही, मेरी अस्थियों की ये इमारत मेरे स्वर्णिम स्वेद की, ये रही सांझी विरासत दी जवानी इस शहर को, और बुढापा गाँव को फिर भी क्यों हर नजर पूछती- मैं कौन हूं? अपने घर मे भूख है लाचारी है और बेबसी है गरीबी रोटियों की, पर अमीरी रिश्तों की घर में बूढ़ी माँ मेरी और है बीमार बाबा उन सभी की आस बनकर जी रहा हूँ, मर रहा हूँ। गंगा बनकर जलप्रलय हर गाँव पर है टूटती जो भी खेतों मे लगा, उन सबको है ले डूबती और ये फसलें हमारी बस चुनावी वोट हैं क्या करें सरकार तेरी ही नियत मे खोट है। पर शिकायत क्यों करें हम कभी श्रीराम से बाजूवों से बल हमारा, हम नियति से क्यों डरें राम जी ने है सिखाया हर मुसीबत से लड़ो राम तुझ को है समर्पित, श्रम के पथ चल रहें।