बचपन से पढ़ता आया हूँ गीता
जैसे रट ली हो पहाड़े की तरह
कभी मतलब नहीं समझा
अर्थ जानता था, समझता नहीं था।
अब जानने लगा हूँ दुनियादारी,
समझता हूँ सही-गलत का फर्क
आगे बढ़ाने की दौड़ में
और ऊपर जाने की होड़ में
जब भूलने लगा हूँ खुद को
भूल सा गया हूँ, स्वयं की पहचान को
रेस जारी है, मशीन बन गया हूँ।
एक दिन लाल कपड़े में लिपटी गीता
मुझे याद दिलाती है
भगवान कृष्ण के वचन-
"मैं आत्मा-परमात्मा"
"मैं काल हूँ, मैं सृष्टि हूँ"
"मैं ही आदि... मैं ही अनंत......"
दिखने लगा है साफ साफ
समझने लगा हूँ, स्वयं के कर्म को।
गीता सुना रही है कानों मे
कर्म के मर्म को, स्वयं के धर्म को।।