कुछ सिक्कों की तलाश में
दर दर भटकता हूँ
लौट जब घर को आता हूँ
घर की तलाश में, घर में भटकता हूँ ।
दीवारों, बन्द दरवाज़ों की क़ैद में
गुमशुदा हवा ढूँढता हूँ
दो बून्द खूशबू की तलाश में
खुली खिड़की बन्द कर आया हूँ ।
राह चल कर, थोड़ी दूर,
लौट आया हूँ
बीच रास्ते में, अधूरे ख़्वाब
अधूरी मंज़िल छोड़ आया हूँ ।
जिस भरोसे पर टिकी थी
बुनियाद मेरे घर की
उस भरोसे की दरख्त को
दाग़दार कर आया हूँ ।
बड़ी ज़ालिम है ये दुनिया,
और दुनिया के लोग
ये जानता था फिर भी
अपनी मासूमियत मार आया हूँ ।
हर पत्थर में भगवान की
शक्ल तलाशता हूँ, पर कमाल है-
माँ-बाप को गाँव में
भगवान भरोसे छोड़ आया हूँ ।