ख्वाहिशों को उड़ने दीजिए, मत रोकिये पांव।
मन मारकर मत बैठिए, चलिये छोड़िए छांव।।
मत रोइए देखकर सूखे खेत, बंजर जमीन
फिर लहलहाएगी खेती, और बहुरेंगे दिन
फावड़े और हल अब चिरेंगे जमीन का सीना
बदहाली-गरीबी टिक पायेंगे कितने दिन।।
दूर आसमान मे जो है चमक रहा
वो कोई तारा या फिर सितारा नही
थक कर मत बैठिये, चलिये चलते रहिये
रूठकर बैठ जाये, ये आपकी किस्मत नही।।
थककर हारकर टूटकर बिखरना है मना
किसी कोने मे बैठकर रोना है मना
माना जमाने ने दिये है दर्द ढेरों आपको
बहाईये पसीना, बहाना आंसुओ का है मना।।
छत से मत निहारिए जरूरतों को,
फैलाकर पंख, भरिए हौसलों की ऊड़ान।
जरूरतों की जमीन छोड़िए जनाब,
बस दो गज दूर है, ख्वाबों का आसमान।।