आँखों से तीर चलाते हैं वो
हमको घायल भी कर जाते हैं वो
और मुजरिम भी नहीं कहलाते वो
हैं बहुत कम दुनिया मैं शख़्स ऐसे
आईने मैं आँखें जो मिला सकें अपने अक्स से
ज़माने को आँखें दिखाते हैं जो
अक्सर आईने से नज़रें चुराते हैं वो
आँखें बन्द हैं पर नींद आती नहीं
चहाता हुँ खो जाऊँ मैं ख़्वाबों में
ये दुनिया की रीत समझ आती नहीं
लड़ना मुझे आता नहीं
प्यार से कोई बात करता नहीं
ख़्वाब फिर से अच्छा देख लिया
बढ़ कर उसने हाथ हमारा थाम लिया
ना पूछी जाती ना देखा वेश
न पूछा मज़हब ना कौन सा देश
दिल से मिल गया दिल जो
ख़्वाब सच्चा हो गया वो


