कहर का चरम है, या यूं कहो ये अंत है
साँच पे आंच का, पहरा नही अनंत है
रात के आखिर पहर, सन्नाटा बेअन्त है
इतना सच कैसे पचे, मुद्दा ये ज्वलंत है
सच हो चला शांत, झूठ है कहकहा रहा
दुःशासन की जय हो, जयघोष है आ रहा
उठो कृष्ण चीर का, छोर अंतिम जा रहा
गदा-गांडीव व्यर्थ है, सुदर्शन कब आ रहा
तुम्ही न कहते थे, बाहुबल विकराल है
शतक की ओर बढ़ रहा, देखो शिशुपाल है
अब तुम्हारे ही हवाले, सत्य की ये ढाल है
हे पतितपावन, बदलो समय की चाल है
