सुनो दो कप चाय आज भी बनी थी
हर रोज़ की तरह अकेले ही पीनी थी
ऑफिस में जरूरतें फ़र्ज़ पूरा करते तुम
अकेले इन्तजार करते हुए उदास से हम
कहाँ वो छोटी-छोटी खुशियाँ खो रही हैं
भागदौड़ में हमारी दुनिया त्रस्त हो रही है
अखबार चाय और सुबह की वो फ़ुरसत
बदल गयी काम की रेल में बनके आफत
क्या क्या हो गया और क्या बाकी रह गया
बस इसी फिक्र में हर एक साथी रह गया
है फैलने लगे हर तरफ तन्हाई और तनाव
दो घड़ी सुकूं से बैठ कर लो इसके बचाव
अपने लिए फकत एक दिन निकाल लिया करो
बुला कुछ अपनों को खुद को सम्भाल लिया करो
हम खुश होंगे तो कामयाबियां मिलेंगी सभी
खुशहाल देश का सपना भी पूरा होगा तभी
NOOR EY ISHAL

