दे सुंदर सीख अनबनी बारिश
कर जाती है बस यही गुज़ारिश
आज पल पल कैसे बीत रहा है
अतीत में कोई इसे खींच रहा है
जा रहा है स्वर्णिम समय भी ऐसे
व्यर्थ की चिंता में गँवाया हो जैसे
साँझ की थकी थकी मद्धम हवा
इक नयी भोर की आशा में है रवाँ
समय बीत गया जो वो कल हुआ
आने वाला कल पर है अनछुआ
क्यूँ कुछ छूट जाने की निराशा है
आगे बहुत कुछ आने की आशा है
मन स्थिर नहीं तो भटकता रहेगा
वक़्त के पहियों संग घूमता रहेगा
कल आज और कल की दौड़ में
ख़ुद ही ये ख़ुद को ढूँढता रहेगा
NOOR EY ISHAL

