प्रेम.....


कहते है जिसे आप पढ़ना चाहते हो अगर उसे अब तक ना लिखा गया हो तो ये आपका कर्त्तव्य ही नहीं धर्म बन जाता है की आप उसे लिखे..... प्रेम...... मेरे लिए सदा ही जिज्ञासा का विषय रहा है...आये दिन आस पड़ोस से ये शब्द कानो में घुसकर मन में कई सारे सवाल एक साथ छोड़ जाता और फिर बेचारा दिल उन सवालो को लिए हुए मन की खिड़खियो से आस पास झांकता रहता है........ जैसे वे सारे जवाब आस पास ही है..... वास्तव में वे सारे जवाब आस पास नहीं हमारे भीतर होते है. प्रेम क्या है.....? किसी से मुझे प्रेम है या नहीं......? मुझे कोई प्रेम करता है या नहीं..?..ऐसे कई सवाल आये दिन सभी के मन में आते रहते है


प्रेम क्या है...... आइये सबसे पहले इसे समझते है, स्मरण कीजिये जब आप इस संसार में आये थे, आपका मन संसार के किसी भी पूर्वाग्रह से रहित था...... बिलकुल खाली और चित्त, चित्त तो अपने शुद्धतम अवस्था में.. उसे ईर्ष्या, घृणा, प्यार आदि किसी भी प्रकार के अच्छे-बुरे मनोभावों का भान ही नहीं था । वास्तव में यही बालक अवस्था प्रेम की सर्वोच्च अवस्था है और एक अबोध बालक सर्वोत्तम प्रेमी। जिस प्रकार बालक के अंतर्मन में ना तो अतीत का पूर्वाग्रह ना ही भविष्य


का भय होता है वह वर्तमान में जीता है और सॉरी प्रकृति को अकारण ही आत्मसात करने का प्रयास करता है सॉरी समष्टि से प्रेम करता है वैसी ही अवस्था प्रेमी की होती है। जिस प्रकार बालक भाषा विहीन शब्द रहित होता है उसी प्रकार प्रेमी भी बोलना नहीं जानता उसे कोई भाषा नहीं आती शब्द तो वास्तव में प्रेम को प्रदूषित कर देते है प्रेम करने के लिए संसार को ना किसी भाषा की


आवश्यकता है ना ही बोली की प्रेमी एक दूजे के अंतर्मन को स्वतः ही जान


लेते है । भाषा से आप कुछ गिने चुने प्राणियों से संवाद कर सकते है जबकि प्रेमी, प्रेमी सॉरी प्रकृति से संवाद करता है..... प्रेम कभी व्यक्ति विशेष के लिए तो होता ही नहीं...वह तो समस्त प्रकृति से होता है। जो प्रेम आप किसी व्यक्ति विशेष के लिए अनुभव करते है वह वास्तव में एक प्रकार की वासना है प्रेम नहीं तो भला कोई भाषा प्रेम के लिए आवश्यक हो सकती है क्या ?......संदेह नहीं.....! अब प्रश्न यह उठता है क़ि फिर क्या वयस्क वास्तविक प्रेम कर ही नहीं सकते...? नहीं ऐसा नहीं है..... वास्तव में वही व्यक्ति प्रेम नहीं कर सकता जिसने अपने अंतर्मन का शत प्रतिशत सांसारिकता में खपा दिया हो। जबकि ऐसा नहीं है विज्ञान ने भी यह माना है की हम अपनी अंतर मन की क्षमताओं का बहुत छोटा भाग ही इस्तेमाल कर पाते है और उसका एक बड़ा हिस्सा हमेशा खाली रहता है। वास्तव में प्रेम इसी खाली, अनछुए मन से किया जाता है ठीक वैसे जैसे बालक करता है जब उसका अंतर्मन बिलकुल खाली होता है।

हम जब भी प्रकृति को अंतर्मन के केवल उस हिस्से से आत्मसात कर रहे होते है जो बिलकुल खाली है अनछुआ है, हम प्रेम कर रहे होते है । चाहे कोई भी काम हो जब हम उसे अतीत के पूर्वाग्रह और भविष्य भय से रहित होकर वर्तमान में रहते हुए अपने मन मंदिर के उस अनछुए हिस्से से कर रहे होते है हम प्रेम कर रहे होते है। ऐसा करना बालक के लिए तो सहज है परन्तु वयस्क के लिए थोड़ा कठिन परन्तु असंभव नहीं


और हां अगर प्रेम के वास्तविक रूप को समझ पाए तो ये अनुभूति अवश्य होगी की एक प्रेमी के लिए अगले दो सवाल "किसी से मुझे प्रेम है या नहीं मुझे कोई प्रेम करता है या नहीं" मायने ही नहीं रखते .....