जो बचपन में थी रानी , माँ-बाप की दुलारी,
अभी कुमकुम कन्या है कुंवारी।
अब पग पड रहे है यौवन में,
क्षीण हो रहा फुल सा मन,छूट रहा अपनों से प्यार । ।
जो मिला है मान-सामान ,उसे सहजने की बारी है आई,
चिंता की लकीरे ,मानो गहरे बादल सी छाई ।
अपना घर है पराया,,पराए घर को है अपनाना ,
पता नहीं कौनसी ,बेला यह आई ।।
कठिन होते है कुछ पल बड़े,जब कोई बदलाव आए जीवन मे।
जिस पुरुष के खातिर छोड़ सर्वस्व,, वही छोड़ना जाए कही अटकल में ।
इक स्त्री की कहानी , पूणर्तः कहाँ में अभी समझ पाई,
जिस जिस अवस्था में आई, उसी भेद को विस्तृत है जान पाई ।
नित नए सपने सॅवारती, अपनो का ख्याल रखती,
दुसरो की राह के कांटे हटाने के खातिर, स्वयं शूल है सह जाती ।।
क्यूंकि,, स्त्री में चाहिए सर्वगुण,,
लेकिन कभी अपने लाल से नहीं पूछोगे की, तुझमे क्या है दुर्गुण ।।
इस स्त्री की जीवनलीला , नहीं है सरल समझपाना
लेकिन जान लो शक्ति तुम भी, मन -मसोसकर ना रह जाना ।।
ईश्वर की इस जीवन श्रंखला की खातिर ,,
अपनी पूर्णता को ना भूल जाना
अपनी पूर्णता को ना भूल जाना ।।


