बिटिया अपनी फूल सी लागे,

वो है हमारी दुलारी,

आंच ना आने देते उस पर,

नाज़ों से पाले अपनी बेटी को,

संस्कारो से बांध दी है,

ना बोले कुछ ,चुप्पी भी सीखा दी है,

बेटी, जब तक हमारे पास है,

बनाके रखेंगे आँखो का तारा,

पता नही आगे ,कैसा रहेगा घर-गुज़ारा।।


साथ ही एक ओर सिख भी देते बेटी,

अभी के प्यार को तू भूल जाना,

मान- सम्मान से भी न रखना मोह,

पहन लेना संस्कार की माला,

अपनी खुशियो को भी कर देना तू किनारा,

लेकिन,मान ना घटाना अब तू हमारा,

प्रेम जो मिला हमसे वही है काफी,

उम्मीद ना अब तू जगाना।।


क्यों, छुई-मुई सी करते हो बेटियो की परवरिश,

बनने दो उन्हें आत्मनिर्भर, करने दो अपना निर्वाह,

चढ़ने दो उसे अपनी मंज़िल की राह में,

ना पकड़ाओ इस तरह उसका दामन किसी ओर को,

की,छूट जाए साथ अगर जो,

दो फिर किस्मत को दोष,

हँसी भी हो जाए उसकी गायब ।


1 बार बेटियो की नज़र से भी देख लो,

कितने परिवर्तन लाए,सबके खातिर,

प्यार दो,

लेकिन,चूंकि है किसी ओर की अमानत,

तू है पराया धन,बोलकर

उसे कोई उपकार न दो,

जी लेने दो उसे भी इस तरह,

की मिले प्यार ,उसे हर सफर में,

हर सफर में ।।


उम्मीदों से मत बांधो पंख उसके,

जी लेने दो उसे भी खुले आसमान में,

ओर हमेशा जी सके वो खुले आसमान में,

खुले आसमान में ।।



..... Nivedita soni