दीप का दीपित उजाला, ज्योति की ज्वाला बनूँ मैं,
बर्फ से भी शुभ्रता लूँ, गिरिराज से स्थैर्यता मैं!
सिंधु का गांभीर्य मुझ में, बिज्जू की हो तीव्रता,
पर्वत वनों से हरीतिमा लूँ, फ़ूलों की कौमार्यता!
चंद्र की शीतल तरंगे, सूर्य का सा ओज हो,
ध्रुव किसी को अडिगता, लेखनी उद्घोष हो!
मिले गुरु की प्रेरणा, और इष्ट की आराधना,
वेद का विज्ञान मुझमें, दें ईश है ये प्रार्थना !!


