देश देश, प्रांत- प्रांत, सुलग रही है आग, अवनी भी कांप- कांप पूछे एक बात है!
धरा में नहीं है कोई धरम- धुरीन ऐसा, अंसूवन धार आज धरणी बहाती है!
हो नेता, राजनेता, अभिनेता, अभियंता, लूट पाट में लगत लोट-पोट होते हैं !
कुर्सी पे बैठे अधिकारी मालामाल देखो, काले- धन को सफेद आज ये बनाते हैं!
जनता जवानि खोती, जान से भी हाथ धोती, धनवान नब्बे से अब सौ का फ़ेर देखे हैं !
नेता, अधिकारी, राजनेता या खिलाड़ी चाहे, कोटि की ये कोठियों में कोटियाँ गिनाते हैं!
नून- तेल, साग- पात होता न नसीब कहीं, कहीं कहीं इतना तो धुएँ में उड़ाते हैं!
न्यूनतम मजदूरी की ये बात करते जो, होटलों में उससे ज्यादा टिप दे आते हैं!
भ्रष्टाचार, कालाधन, महंगाई की भी मार, लोकपाल बिना हि तो सत्ता सुख पाते हैं!
रामदेव, अन्ना जैसे संत की कमर तोड़ी, आम जनता का खून खूब चूस जाते हैं!
पत्रकार आज देखो, गिद्ध बने देख रहे, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का राग भी सुनाते हैं!
लोकतंत्र में बताओ कौन सा स्तंभ बचा, अपने को पाक-साफ आज सब बताते हैं!
चारा हो या कोयला, 2G हो या तोप- सौदा, शिक्षकों की भर्ती का राग ऐसे गाते हैं!
खेल- तेल- रेल में हो, अफसरी जेल में हो, मेल से बेमेल का ये खेल खेल जाते हैं!
राष्ट के विरोधी, आतंक को जो सींच रहे, ऐसे आततायियों को शरण न दीजिए,
जीवन जटिल जो कि जोगियों के हुए आज, आम जनता को नाच अब न नचाइए!
- 'अबोध'


