झूठ बदला है अब यक़ीनों में

साँप बैठा है आस्तीनों में


आदमी आदमी नहीं है अब

बदल के रह गया मशीनों में


रब की मौजूदगी है रूहों में

न ही मंदिर में न मदीनों में


रंग में,रूप में ख़्यालों में

हम ने बाँटा है ख़ुद को दीनों में


ख़ुद हैं किरदार भी,तमाशा भी

ख़ुद खड़े हैं तमाश-बीनों में


हमने जायदादें नहीं बाँटी

रिश्ते बँट गए ज़मीनों में


जलजले से तो बच गए लेकिन

आख़िरश डूब गए सफ़ीनों में


जरा सी चाहिए हवा सब को

आग रहती है सब के सीनों में


यही चालाकी भी हक़ीक़त भी

दाग छुपते हैं अब क़रीनों में


ख़्वाब सच्चाई में बदलते हैं

तर-ब-तर जो भी हैं पसीनों में


खुशनसीबी गुज़र गई पल में

दर्द सालों में ग़म महीनों में