बस राहों को यक-टक तकते रहते हैं
दरवाज़े भी दस्तक तकते रहते हैं
जाने वाले जब तक ओझल होते हैं
घर वाले भी तब तक तकते रहते हैं
दालानों में जब भी तन्हा होते हैं
दादा जी की बैठक तकते रहते हैं
आँखों में जब माजी दस्तक देता है
दीवारों को यक-टक तकते रहते हैं
जब खर्चे के पैसे कम हो जाते हैं
घर में रक्खे गुल्लक तकते रहते हैं
देखूँ मैं भी मुझ को चाहने वाले लोग
मेरा रस्ता कब-तक तकते रहते हैं
आँखें जिन में अपनी दुनिया होती है
उन आंखों को अन-थक तकते रहते हैं
चाय उबल कर गिर जाती है चूल्हे पर
और हम तब तक अदरक तकते रहते हैं
इस जीवन के अँधेरे में हम सारे लोग
बस एक रोशन दीपक तकते रहते हैं
