यह प्रलय का सूर्य जाने कब ढलेगा

जाने कब होगा अमृत सा उजाला

वेदनाएं और कितनी होंगी प्रखर अब

सृष्टि प्रलय के मुख कालिख कब मलेगा


यह कष्ट का क्षण असहनीय बहुत है

दृश्य यह भीषण है दारुण दुख भरा है

काल कवलित हो रहे हैं लोग जैसे

नव बसंत के मध्य कोई पतझड़ हुआ है

यह रुदन का शोर जाने कब रुकेगा

शांति से सिंचित होगी जाने धरा कब

और फलित होंगे स्वप्नों के बीज कैसे

स्नेह का अंकुर धरा से कब उगेगा


यह भयानक है अथाह संत्रास का पल

जिंदगी भी कर रही हमसे बड़ा छल

बांध धीरज का जाने कब टूट जाए

किसी तरह यह पल पीछे छूट जाए

कार्य यह दुष्कर बड़ा है जान लें सब

फिर भी मुश्किल है नहीं यदि ठान लें सब

प्रार्थनाओं में गुजरता रात दिन है

घोर अंधियारे में दीपक कब जलेगा


काल सम्मुख जैसे मुंह खोले खड़ा है

सृष्टि सारी लील जाने को अड़ा है

है सहज संसार में जीना नहीं अब

पीड़ा के अश्रु और पीना नहीं अब

है समय विपरीत बाधाएं अधिक हैं

है शिकन माथे पर चिंतित हर पथिक है

प्रश्न सबके एक हैं सब पूछते हैं

गोद में चिंता के सुख कब तक पलेगा