रोशनी की चाह में चराग़ से लिपट गए

इस तरह हम एक दिन आग से लिपट गए


नींद चैन भी गया और सुकून साथ-साथ

अजनबी ख़्याल कुछ दिमाग़ से लिपट गए


तितलियां पसंद हैं मुझे बहुत सो एक दिन

तितलियों की तरह फूल बाग से लिपट गए


जानते थे झूठ है मगर थे हिज़्र के बरस

रोज रात एक सब्ज़-बाग़ से लिपट गए


इस तरह से मिट गए बदन के दाग़ दाग़ से

मिल गए जो दाग़ , दाग़-दाग़ से लिपट गए


आँसुओं ने घर बना लिया हमारी आँख में

तंग आ के हम भी खुश-दिमाग़ से लिपट गए