जब कभी आजिज़ी सी लगती है
भली दुनिया बुरी सी लगती है
जानने वाले बहुत हैं फिर भी
ये दुनिया अजनबी सी लगती है
गांव के दरमियान आते ही
एक नई ताज़गी सी लगती है
सुबह होती है ख़ूबसूरत और
शाम भी शबनमी सी लगती है
उसकी आंखें नहीं महज आंखें
कोई गहरी नदी सी लगती है
उसे एक शख्स के तसव्वुर से
ज़िंदगी, ज़िंदगी सी लगती है
देख कर उसको लोग कहते हैं
एक लड़की परी सी लगती है
यही होता है इंतज़ार में अक्सर
एक घड़ी भी सदी सी लगती है
अपनी दुनिया का हाल वो जाने
मेरी दुनिया मेरी सी लगती है
चलते-फिरते हुए बुत की सूरत
हु-ब-हू आदमी सी लगती है
सारी दुनिया की एक कहानी है
इसलिए शायद सुनी सी लगती है
