मेरी आँखों में सूरज का कोई ख़्वाब नहीं
मुझे चिराग़ बनाना है आफ़ताब नहीं
मुझे अंदाज़ हो मेरे सफ़र की मुश्किल का
सो मेरी राह में कांटे हों बस गुलाब नहीं
मैं इसलिए भी ख़ुद को ज़ख़्म देता रहता हूँ
मुझे बर्बाद तो होना है मगर ख़राब नहीं
अपने आप को वो चाँद क्यों समझती है
हाँ उस में नूर है लेकिन वो माहताब नहीं
मुझे जवाब नहीं देना उस की बातों का
मैं चुप हूँ इसका मतलब मैं ला-जवाब नहीं
गौर से देख मेरी आँखों में मेरे मालिक
इनमें आँसू भी हैं सिर्फ ख़्वाब-ख़्वाब नहीं
इश्क़ वीराने को भी सब्ज़ बना देती है
इश्क़ से बढ़कर कोई और इंकलाब नहीं
जिसमें ज़िंदगी लिखी हो शायरी की तरह
मेरी निगाह में तो ऐसी कोई किताब नहीं
ख़्वाब होते नहीं जब तक कि मुक्कमल मेरे
ये मेरी तकलीफ़ मेरा दर्द कामयाब नहीं

