ना कारीगर और न पत्थर कर सकता है

सिर्फ मोहब्बत ही घर को घर कर सकता है


तुम पूछो कि और हुनर क्या कर सकता है

हां एक पत्थर को भी ज़ेवर कर सकता है


रब के सिवा है कौन यहां ऐसा कारीगर

जो मिट्टी के बुत को पैकर कर सकता है


दुनिया नहीं बदल सकती एक ज़िद्दी ज़िद को

ये काम दरअसल बस एक ठोकर कर सकता है


हम साथ रहे तो क्या होगा ये पूछने वालों

कतरा-कतरा मिलकर सागर कर सकता है


कलमकार की ताकत क्या है पूछिए हमसे

एक कलम को पूरा लश्कर कर सकता है


वक़्त के हाथ में क़ैद है सबकी क़िस्मत यारों

वक़्त सिकंदर को भी दर-दर कर सकता है


दोस्ती, प्यार, मोहब्बत, सादादिली, सच्चाई

रिश्तेदारी और भी बेहतर कर सकता है


बस एक मुफ़लिस है जो इस धरती को पैरहन

और आसमान को अपना छप्पर कर सकता है


ये ख़ास हुनर है सिर्फ मोहब्बत के हिस्से में

आंखों को साग़र या ख़ंजर कर सकता है


एक से एक करिश्माई हैं काम ख़ुदा के

पानी की एक बूंद को गौहर कर सकता है


किसी किरदार की सच्चाई को सच-सच बयाँ

उसका तौर-तरीका, तेवर कर सकता है


उसकी आंखों में जाने क्या जादू है

जिसको जब चाहे दिलबर कर सकता है


लोगों को लड़वाना या दंगे करवाना

ये काम सियासत-दाँ अक्सर कर सकता है


उसके लिए तो खेल महज है जान ज़िस्म का

जब चाहे अंदर-बाहर कर सकता है