बुझे चराग़ो को फिर रौशन कौन करे

जानबूझकर दुख के दर्शन कौन करे


सब कहते हैं इश्क़ नहीं आसां बिल्कुल

तो मुश्किल को अपना जीवन कौन करे


इश्क़ में पहले जैसी लज्जत कहां रही

एक-दूजे को अपना तन-मन कौन करे


अब विरह के गीत नहीं गाता कोई

अपनी आंखों को अब सावन कौन करे


कोई राधा नहीं है अब ब्रज गलियों में

गोकुल का ख़ुद को मन-मोहन कौन करे


सब ने सोचा है बस झूठ ही कहना है

सच कह कर दुनिया को दुश्मन कौन करे


सबको बस औरों में बुराई दिखती है

अपने आप को अपना दर्पण कौन करे


सबको है महफ़िल की ख़्वाहिश दुनिया में

वीराने को अपना मस्कन कौन करे