इकरार कीजिए या इंकार कीजिए
जो कुछ भी कीजिए उसका इज़हार कीजिए
यूं तो हर किरदार की है ख़ासियत अपनी
मौजूं जो हो मगर वही किरदार कीजिए
गुरबत के मारे लोगों को रोटी तो दीजिए
रहमत जरा सी इन पर सरकार कीजिए
रखिए भी कुछ बचा कर ख़ुद में अपने लिए
ये ज़िंदगी है इसको नहीं अख़बार कीजिए
बांट सकते हैं अगर तो बांटिये मोहब्बतें
नफ़रत का लेकिन नहीं व्यापार कीजिए
ग़र डूबने लग जाए कश्ती बीच भंवर में
अपने हौसले को अपना पतवार कीजिए
इस तंगहाली में न मुझसे मांगिए कुछ भी
इस कदर मुझको नहीं लाचार कीजिए
एक नया मुकाम अगर चाहते हैं आप
तो मुश्किलों को अपना घर-बार कीजिए
टूट जाए इतना कि जीना मुहाल हो जाए
यूँ न ख़ुद को इश्क का बीमार कीजिए


