कहां सबकी सहूलत देखते हैं
फकत अपनी जरूरत देखते हैं
उदासी अपनी बहलाने चले हैं
चलो कुछ खूबसूरत देखते हैं
गुमाँ जब सिर प चढ़कर बोलता है
तो हम मिट्टी की सूरत देखते हैं
नजर दस्तार पर जाती है पहले
हम उसके बाद दौलत देखते हैं
ये कैसे लोग हैं जो दिल लगाकर
कयामत ही कयामत देखते हैं
ये आसानी कहां से कैसे आई
चलो चलकर मुसीबत देखते हैं
कभी फुर्सत हुई तो फिर मिलेंगे
कोई अच्छा महूरत देखते हैं
ये दुनिया तो बुरी है कहने वाले
भला कब अपनी नीयत देखते हैं
कभी हम देखते हैं जेब खाली
कभी बच्चों की सूरत देखते हैं
