दिल के दरिया में उतर कर देखा
मैंने कश्ती में समंदर देखा
जब भी देखा है हसीं-तर देखा
चाँद को आज खुले-सर देखा
मंज़िलें देख ली कैसे उसने
राह देखी नहीं रहबर देखा
ख़्वाब देखे कहीं देखी आँखें
नींद देखी कहीं बिस्तर देखा
मैंने देखा है ख़्यालों का बदन
और इक ख़्वाब को छूकर देखा
मुद्दतों होश में आया ही नहीं
मैंने जब हुस्न का पैकर देखा
मैंने रातों में जलाए सूरज
और इक चाँद को दिन-भर देखा
उसके हाथों की लकीरें देखी
मैंने यूँ अपना मुक़द्दर देखा
