तर-ब-तर ज़ख़्म में थी छालों में
ज़िंदगी थी खराब-हालों में
मैंने बरसों इसे सँवारा है
जा के अब आई है मिसालों में
वक्त बदला तो लोग भी बदले
देखिए कितने बीते सालों में
काग़ज़ों पर नकल उतारी है
शेर लिक्खे गए ख़यालों में
देख पाई नहीं हमें दुनिया
हम छिपे बैठे थे उजालों में
मैंने देखा है आज नुक्कड़ पर
पीने वाले थे होश वालों में
आप जो देखते हैं आज मुझे
बनते बनते बने हैं सालों में
इस ज़माने से पहले हम भी थे
ख़ुद को बर्बाद करने वालों में
कब से उलझे हुए हैं लोग यहाँ
दश्त-ए-उलझन में जिस्म जालों में
दर-असल में जवाब होते हैं
मिश्र अक्सर छिपे सवालों में
