बस तुम्हारी याद बाकी है ज़ेहन में

अब कभी आते नहीं तुम अंजुमन में


दूर तक बिखरे हैं बस कांटे ही कांटे

गुल कहाँ खिलते कभी उजड़े चमन में


किसको देखें अब कोई सूरज नहीं है

बस अंधेरा ही अंधेरा है गगन में


अब यहां होता नहीं कोई करिश्मा

टूटता तारा नहीं दिखता गगन में


जो मुसाफिर हैं घरों को लौट आएं

देर तक रहते नहीं वीरान वन में