जहां कहीं भी देखिए लंबी क़तार है

लाचार है व्यवस्था शासन बिमार है


जनहित के मुद्दे सभी पांव पैदल हैं

धार्मिक उन्माद अब रथ पर सवार है


लोकतंत्र दिखता नहीं आजकल कहीं

कह रहे थे एक कवि शायद बुख़ार है


पूछ रहे हैं आप कि शासन ने क्या किया?

विश्व गुरु में आपका भारत शुमार है


आप अगर सरकारी मेहमान हुए हैं

सरकार का ये आपके प्रति दुलार है


लग रही है बोलियां किरदार की यहां

लग रहा है शायद ये आदम बज़ार है


देश हित में आपका भी योगदान है

रोटियां नहीं है या कि कम पगार है


कारीगर ने कहा ये हवादान है

जब पूछा कि दीवार में कैसी दरार है?


कहते हैं एक काम पर विशेष ध्यान दें

काम बहुत प्रधान को चिंता हजार है


व्यर्थ की चिंता लिए क्यों फिर रहे हैं आप?

आनंद ही आनंद है सच में बहार है