बाबूजी थे सब अच्छा था।

भोला सा बचपन सच्चा था।

खुशियों का संसार सजा था

रौनक थी दालानों में

सपनों के भी पंख लगे थे

सच्चाई थी अरमानों में

घर भी भरा भरा लगता था

ख्वाहिश भी सब पूरी थी

गुड्डे-गुड़िया,खेल-खिलौने

इन सब की मंजूरी थी

रिश्ते पक्के थे माना की

मिट्टी का घर था कच्चा था ।

बाबूजी थे सब अच्छा था ।