आपको याँ देख कर अच्छा लगा
मुद्दतों के बाद घर अच्छा लगा
फूल तितली रंग-ए-मौसम ही नहीं
इश्क़ में दीवार-ओ-दर अच्छा लगा
थक के जा बैठे उसी की छाँव में
धूप में बूढ़ा शज़र अच्छा लगा
बुझ गई जब रात सूरज जल उठा
शब के माथे पर सहर अच्छा लगा
मुश्किलें थी ठोकरें थी ज़ख़्म थे
हां मगर सच का डगर अच्छा लगा
जो मसीहा थे रिहाई के उन्हें
पिंजरों में कैद पर अच्छा लगा
पी गए सब मान कर अमृत उसे
प्रेम में सबको जहर अच्छा लगा
और भला कदमों में कब अच्छे लगे
मिश्र'गर्दन पर ही सर अच्छा लगा
