यह जिस्म कह रहा है बस और अब नहीं

यानी कि अब इसे भी दश्त-ए-तलब नहीं


यह जात पात क्या है यह रंगभेद क्या

हम जो यहाँ है सारे क्या हम-नसब नहीं


ऐसा नहीं है कुछ भी जो व्यर्थ हो यहाँ

बेकार कुछ नहीं है कुछ बे-सबब नहीं


यह जिस्म क्या है जादू उसमें भी साँस खेल

बुत दौड़ता फिरे है क्या यह अजब नहीं


हाँ कुछ दिनों से हैं हम दौलत की राह में

भूला नहीं है ख़ुद को भूले अदब नहीं


यह कौन जानता है किस के हुजूर है

अब कौन कब यहाँ है और कौन कब नहीं


जितनी ज़रूरतें हैं उतनी मिले बहुत

उतना ही चाहते हैं अरबों-खरब नहीं


हो कोई जग में ऐसा तो मान लें ख़ुदा

जिसका न ख़ुद से लेना ख़ुद की तलब नहीं


हम इस भरम में अपनी मुश्किल छुपाते हैं

आसान तब थी दुनिया आसान अब नहीं


चिल्लाएँ चीखें रोएँ कुछ दर्द कम करें

दिन दोपहर है कोई वक्त-ए-निस्फ़-शब नहीं


यह आखिरी सफ़र है मालूम तो चले

क्या मुक्तसब हुआ है क्या मुक्तसब नहीं


हम से भी पहले कितने आए गए यहाँ

महफ़िल रवाँ रहेगी हम होंगे जब नहीं


वो जा चुका है कब का फीकी हुई चमक

ख़्वाबों का वो सितारा आँखों में अब नहीं


मरने के बाद भी तो दौलत का खेल है

चंदन मिला है कुछ को कुछ को हसब नहीं


यह वक्त का असर है इन नौजवानों पर

ऐसा नहीं कि इनमें इल्म-ओ-अदब नहीं