अब जिंदगी वीरान सी लगने लगी है
उसकी यादें सिसकियां बनने लगी है
हम तो बस मेहमा यहां दो-चार दिन के
जिंदगी की शाम अब ढलने लगी है
अब दरख़्तों का नहीं साया है मुझ पर
अब शजर खुद छांव में पलने लगी है
अब तलक कोई नहीं था साथ मेरे
उसकी यादें साथ अब चलने लगी है
जिंदगी भर साथ का वादा किया था
अब हाथ मेरा छोड़ कर चलने लगी है


