हाँ रो पडती हूँ मैं.... जब लेबर रूम से आती कराहों को किलकारी में तब्दील होते सुनती हूँ। पलकें भीग जाती हैं मेरी..... जब किसी गुडिया को ओढनी लपेटे मां होने का नाटक करते देखती हूँ। आंसू तब भी निकल पडते हैं मेरे... जब किसी स्कूल जाती बिटिया को, पापा की ओर हाथ हिलाते देखती हूँ। आंखों के कोर सील जाते हैं ........ जब उसका प्यार मेरे गालों पर , अपनी नन्ही सी निशानी छोड जाता है। हाँ पलकें भीग जाती हैं मेरी. ..... जब स्कूल के टिफिन में बंद , माँ की रसोई याद आती है। कुछ गीलापन आंखों में तब भी महसूस होता है, जब राखी पर भाई की कलाई का इंतजार, सबसे अच्छा कार्ड चुनने और लिफाफे को सलीके से चिपकाने की मशक्कत में बदल जाता है। कुछ बूंदें गालों पर तब भी बिखर जाती हैं जब ख्याल आता है कि , गरमी की तपती दोपहर के सन्नाटे में माँ और पापा के कान फोन की घंटी के शोर का इंतजार कर रहे होंगे। और हाथ खुद ब खुद उठा लेते हैं फोन। हाँ रो पडती हूँ मैं अक्सर भावुक होकर...... पर साहब ये आंसू कमजोरी नहीं है। ये तो ग्रीस है , जो भावनाओं के नट बोल्ट को दुनियादारी के फिरक्शन से बचाता है और रिश्तों की उम्र बढाता है।।।।।। NITYA