हसरतें चहलकदमी करती रहती हैं , तुम्हारी हरारत भरी हाथों की उंगलियों में। तन्हाइयां बुनती रहती हैं , सिर्फ तुम्हारी तस्वीरें। ठहर जाते हैं ख्याल , तुम्हारी एक खामोश आवाज पर। ठिठक जाती है दुनिया , तुम्हारी दहलीज पर आकर । मेरे ख्वाबों के पंख भी ठिठुर से जाते हैं , तुम्हारे संग आने वाली , सर्द हवाओं की सरसराहट से। एक अनचीन्हा , अबूझ , अनसुलझा सा बंधन है यह। इसलिए शायद ढूंढती हैं मेरी आंखे बार बार तुम्हारी उन आँखो को , जो मेरी आँखों के सवालों को समझ कर अधीर हो जाती हैं। सोच रहा हूँ , इस कडी..... इस रिश्ते का नाम। शायद साथी...... पर साथी तो नहीं कह सकता तुम्हें क्योंकि, साथ निभाने का वादा तो नहीं किया है तुमसे। शायद दोस्त...... पर दोस्त भी तो नहीं हो तुम। क्योंकि मेरा समर्पण निश्छल नहीं है। और यह बंधन प्यार का भी तो नहीं है , क्योंकि अपेक्षाएँ पूरी नहीं कर सकता मैं। अब मुझे यकीं हो गया है, कि कुछ बातें अनकही और कुछ रिश्ते अपरिभाषित रहें, तो अच्छा है।।।।।।।।। © NITYA 2016