खिडकी कर ली थी बंद मैंने, कि हवा तक न आने पाए। फिर भी धीरे से ...... बालों को सहला गया कोई। मूंदी थी आंखें कि हकीकत दूर तो हो। पर हौले से सपने सजा गया कोई। छूना भी न चाहा सतह को कि शायद ख्वाबों का बुलबुला उडता रहे..... और चुपके से एहसास हिला गया कोई। हथेलियों से मुंह को ढांक कर हकीकत को कल्पना करने की कोशिश हार गई। जब आवाज़ देकर ....... दीवारें गिरा गया कोई। सबकुछ गांठों में बंद कर तमन्नाओं की कब्र बना ली थी। सिर्फ उंगली से सारी गर्द हटा..... मुझे मेरी खुशी से मिलवा गया कोई। और मैं एकटक निहारती रही...... उस अजनबी को , जो कभी अपना न था. ...........। पर अब लगता है शायद वो अजनबी भी नहीं रहा।।।।।।।। Nitya (C)