देर से एक हवा का झौंका

मुझे सहलाते हुए,

कंपाते हुए चला जाता है।


कैसे समझाऊं उस झौंके को

कैसे बताऊं उसे मन की कशिश

कि आज,आना है तुमको।


यूं...कब से बैठा हूं, पशोपेश में,

वो झौंका.

जो पहुंचा रहा है ठंडक मुझे।


याद दिला देता है वो पल

जब धूप में खड़े होकर

किया था इंतजार तुम्हारा।


आज भी, हर रोज़ की तरह

ठीक इस जगह पर खड़े होकर

सोचा है, अपने उस बेनाम प्यार को

जो आएगा कभी तो

आज नहीं तो कल

रच जाएगा, बस जाएगा,

मेहंदी की तरह मेरे हाथों पर

मेरे जिस्म पर

...कभी तो, एक बार।