
मातृभूमि के नाम पर हम सर झुकाने में कतराते हैं ।
राष्ट्रगान होने पर हम खड़े होने में हिचकिचाते हैं ।
अरे,उनसे पूछो जो हमारे लिए दिन रात अपना लहू बहाते हैं ।
हम तो बैठे अपने घरों में करते रहते हैं ठिठौली ।
नहीं सोचते उनके लिये जो हमारे लिए झेल रहे पत्थर और गोली ।
एक आंतकवाद
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