कल रात हवा भी खूब चली,
और ले आयी,
मेरे आंगन में, अपने साथ एक सूखा पत्ता,
ना जाने क्यों, मैं घंटों देखता रहा उसे !
और फिर,
बढ़ती हुई सांसों को थामकर, उठाया उसको..
और कुछ लिखा भी उस पर...
उस पर, मैंने तुम्हें मनमीत लिखा,
या यूं कहूं, कि प्रेमगीत लिखा,
और सौंप दिया उसे, फिर उन्हीं हवाओं को,
ये सोचकर.. कि ये कभी किसी दिन पहुंचेगा..
तुम्हारे आंगन में भी !!
~ नितिन कुमार हरित

