सुनो स्त्री,
तुम जब तक, स्वयं को कहती रहोगी,
पीड़ित,
अबला,
निसहाय...
तब तक...
सतायी जाओगी,
और इसकी दोषी भी होगी, तुम ही,
पुरुष नहीं ।
~ नितिन कुमार हरित


सुनो स्त्री,
तुम जब तक, स्वयं को कहती रहोगी,
पीड़ित,
अबला,
निसहाय...
तब तक...
सतायी जाओगी,
और इसकी दोषी भी होगी, तुम ही,
पुरुष नहीं ।
~ नितिन कुमार हरित