जब शांत हृदय के ठहरे जल पर, शब्द गढ़े जाते हैं,

आँख मूंद प्रेमावर्त मन से पूर्ण पढ़े जाते हैं।

एक एक आखर कह देता है, सारे संदेशों को,

स्वर शब्दों का ढह देता है, तन मन के भेषों को।

भेष नहीं तो भेद नहीं, फिर जल से जल मिलता है,

निर्मल जल के इसी ताल में, प्रेम पुष्प खिलता है।

प्रेम पुष्प जो खिला 'हरित' फिर, क्या खोना क्या पाना,

प्रेम हृदय की एक चाह बस, पूर्ण प्रेम हो जाना।


- नितिन कुमार हरित