प्रेम है जीवन, प्रेम समर्पण, प्रेम हृदय के भावों का अर्पण, 

प्रेम हमारे पथ का दर्पण, प्रेम ही कृष्ण है, प्रेम ही राधा।

प्रेम है जीवन की रस धारा, प्रेम में जीता ये जग सारा,

प्रेम के आगे ईश भी हारा, प्रेम में फिर कैसी है बाधा?

प्रेम ही तन है, प्रेम ही मन है, मन के भीतर का कन-कन है,

कन-कन में ये राम रमन है, कब है अधूरा? कब है आधा?

प्रेम में कैसी लोक हंसाई , राधा हो या मीरा बाई,

अपनाकर सारी कठिनाई, प्रेम को साधें, प्रेम ने साधा।।


~ नितिन कुमार हरित