प्रेम के प्रश्न !
क्या तुम्हें स्वीकार होंगें, प्रेम के आक्षेप सारे?
या के शब्दों की चुभन से, कल मुझे तुम छोड़ दोगे?
प्रेम की दीपित धरा पर, छा गया जो कल अंधेरा,
साथ दोगे, या मेरा विश्वास यूं ही तोड़ दोगे ?
मैं तुम्हारे संग चलूंगी, हाँ मगर चलने से पहले,
एक यही वो प्रश्न है, मैं जिसका उत्तर चाहती हूँ।
सौंप दूंगी एक ही क्षण में, मैं तुम्हें अधिकार सारे,
बस हृदय में मैं तुम्हारे, सम्मान का स्वर चाहती हूँ।
- नितिन कुमार हरित

