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माँ जैसी है अपनी हिंदी

भारत-गौरव, अर्पण, दर्पण, नव जीवन, नव आशा है,

एक डोरी में बांध रही है, अद्भुत हिंदी भाषा है।

कभी छंद बन छन-छन छनकी, कभी रसों की खान बनी,

जीवन के हर रंग, अंग में, हिंदी ही पहचान बनी।

फिर क्यूं जाने आशाओ

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