भारत-गौरव, अर्पण, दर्पण, नव जीवन, नव आशा है,

एक डोरी में बांध रही है, अद्भुत हिंदी भाषा है।

कभी छंद बन छन-छन छनकी, कभी रसों की खान बनी,

जीवन के हर रंग, अंग में, हिंदी ही पहचान बनी।

फिर क्यूं जाने आशाओं का, साथ अचानक छूट रहा,

हिंदी भाषी इस भारत में, हिंदी का दम टूट रहा।

फिर से कुछ विश्वास संजोएं, स्वप्न सभी साकार करें,

माँ जैसी है अपनी हिंदी, माँ जैसा ही प्यार करें।।


~ नितिन कुमार हरित