मैं एक बूँद हूँ मैं क्या कर जाऊंगी,
चमक तेज है कितनी सूरज की देखो,
ना जाने कहाँ सूख मर जाऊंगी,
चली जा रही सोचती - सोचती ।
मगर बूँद वो ही सागर में गिरी,
सागर में गिरी और सागर बनी,
ये सूरज चमकता लगातार तबसे,
पर अस्तित्व उसका अटल आज भी,
वो सागर ही है, जब से सागर बनी !
~ नितिन कुमार हरित

